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kanchan kishore

patna

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हजार करोड का तमाशा खत्‍म, परिणाम का इंतजार

Posted On: 3 Jun, 2013  
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…दामिनी…गुडिया…सिलसिला चलता रहेगा दोस्‍त

Posted On: 22 Apr, 2013  
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संजय दत्‍त को राहत तो औरों को क्‍यों नही

Posted On: 26 Mar, 2013  
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बाला साहब : नायक या खलनायक

Posted On: 19 Nov, 2012  
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बच के भइया, सेक्‍स क्रांति का दौर है

Posted On: 5 Oct, 2012  
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गौतम दा को श्रद्धांजलि

Posted On: 24 Sep, 2012  
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कांग्रेस का सौ प्‍याज खाने का फैसला

Posted On: 16 Sep, 2012  
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राज के बयान पर बवाल के मायने

Posted On: 2 Sep, 2012  
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आम चुनाव-2014 : अच्‍छी पार्टी बनाम बुरी पार्टियां

Posted On: 4 Aug, 2012  
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माडर्न अनारकली बनाम ओल्‍ड जिल्ले इलाही

Posted On: 1 Apr, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अच्छी पार्टी और बुरी पार्टी इस तथ्य का निर्धारण कौन करेगा जनता या ये वर्तमान पार्टियाँ हमेशा से लोकतंत्र और जनतंत्र की दुहाई देने वाली ये वर्तमान पार्टियाँ जब संसद में जन्लोक्पल को पारित करने का समय आया तब ये एक्सिरे से इकठ्ठे होकर यही कहना शुरू किये की कोई बिल सड़क पर नहीं बनता बिल या कानून संसद में बनता है लेकिन किसी नेता ने कभी यह नहीं कहा की सांसद चुने जाने के बाद उनकी जनता के प्रति कोई javabdehi इन नेताओं की banti है या नहीं जब इन नेताओं को apna वेतन भत्ता बढ़ाना होता है तब इनकी सबों की राय एक हो जाती है उसमे कोई विवाद नहीं होता और जनता का कोई कम या कोई बिल पास करना होता है तब इनकी जमात अलग अलग पार्टियों में बाँट जाती है और इसका मकसद केवल यही होता है की सी अकरी का क्रेडिट उसको क्यूँ न मिले क्यूँ सत्ता दल को हिन् मिले अतः यह एक अच्छा और सराहनीय कदम है अन्ना हजारे कितीम ने सर्कार एवं कांग्रेस की यह चुनौती भी स्वीकार की अगर जनता का कुछ कम करना है तो चुनाव लड़कर संसद में आयें और फिर अपने मन का कानून बनायें इन नेताओं से कोई पूछे आखिर उनको जनता ने किसलिए चुनकर भेजा था ? क्या घोटाले करने का हिन् उनका चुनावी अजेंडा था काहिर ऐसी बैटन का वर्तमान सर्कार या नेताओं पर कोई नहीं पड़ने वाला अब तो टीम अन्ना ने सोचना है की कैसे करोड़ों बेईमानो में कुछ सौ लोगों को इमानदार और समर्पित नेता मानकर चुनाव लड़ेगी कैसे पार्टी बनेगी यह एक चुनौती पूर्ण कार्य है और इस कार्य में टेलीविजन मिडिया की भरपूर मादा की जरुरत पड़ेगी आजकल टेलीविजन पर कई प्रोग्राम ऐसे दिखाए जा रहें हैं जिसमे समज को समर्पित लोगों का साक्छात्कार दिखाया जाता है और उनके द्वारा किये जा रहे है कार्य भी समाज की उन्नति और उत्थान के छेत्र में काफी लाभकारी हैं . हाँ इतना जरुर है ऐसे लोगों की अभी बहुत कमी है अतः टेलेंट हंट की तर्ज पर ऐसे लोगों की खोज करनी पड़ेगी अभी बहुत साडी प्रतिभाएं आज प्रचार प्रसार की कमी के वजह से दबी पड़ी हैं क्यूंकि उसमे भी राजनीती समां गयी है इस देश में पुरस्कृत भी वहिओ होता है जिसका कोई गद फादर हो वर्ना गुमनामी के अँधेरे में वह खोया रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है क्यूंकि ऐसे समर्पित लोगों का जीन भी इन बेईमानो ने दूभर कर दिया है आज व्हिसल ब्लोवर की हालत वैसी हिन् है इनकी हत्या कर दी जा रही है अतः गुंडा तंत्र पूरी तरह हावी है आज अपने देश में और न्याय प्रणाली अन्याय का समर्थन करती दिखाई पड़ती है और न्याय मिलने में देरी इतनी होती है की न्याय मिलने से पहले न्याय के इच्छुक ब्यक्ति की मौत हो जाती है तो अगर कोई विकल्प देना है तो सबसे पहले अपनी न्याय प्रणाली को कैसे सुद्घारा जाये इसपर विचार करना होगा आज देश की न्याय प्रणली के सुस्त रहने के चलते अपराधी हम पर राज कर रहे हैं, दुसरे चुनाव ब्यवस्था में भी भरी परिवर्तन की गुन्जायिश है अगर चुनाव आयोग सशक्त होता तो अपराधियों को टिकट क्यूँ कर मिलता अतः चुनाव आयोग को और ज्यादा अधिकार मिलना चाहिए और अन्ना दल को अभी से उसमे क्या परिवर्तन करना है यह देखना होगा

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के द्वारा: दीपक कुमार श्रीवास्तव दीपक कुमार श्रीवास्तव

कंचन जी ! बीच में एक और बड़ी महंगाई का किस्सा याद आ गया | बात १९६७ की है तब मैं करेरा मध्य प्रदेश में रहता था | महंगाई १००% से ३००% तक बढ़ गयी | उड़द तीन रु किलो, मूंग छ: रु किलो, मकई आठ आना किलो, गुड पांच आना किलो, और भी हर चीज़ बहुत महंगी हो गयी | काका हाथ रसी जी नें एक हास्य छपाई निकाली जो धर्मयुग और एक और साप्ताहिक में छपी | उसका सार इस परकार है, "आओ भाई दाल ले जाओ भाई , तोलने से अब छूटे भाई | उड़द आने के पंद्रह दाने, मूंग आने के दस दाने, मकई आने के १०० दाने | कुछ इसी किसम की छापयीयाँ छपी थीं उस वक़्त | आप समझ गए होंगे के महंगाई उस वक़्त ज्यादा थी या आज जब के आज एक पक्के मजदूर की माहवार तनख्वाह बारह से पंद्रह हज़ार रु है और उस वक़्त दिहाड़ी के हिसाब से एक रु बारह आना दिहाड़ी मिलती थी | अगर पूरा महीना काम कर पाते तो ४५ से ५५ रु के बीच कमाई हो पाती थी | फौजी की तनख्वाह ५९ रु माहवार थी , आज कम से कम बारह हज़ार माहवार पाते हैं | ज़रा हिसाब लग्यें तो पता चलेगा के उस वक़्त वाकई महंगाई ज्यादा थी | धन्यवाद्

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